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हाथ छूटे भी तो रिश्ते नहीं छोड़ा करते
एक पुराना मौसम लौटा
आँखों में जल रहा है क्यूँ
वो ख़त के पुरजे उड़ा रहा था
शाम से आँख में नमी सी है
जिंदगी यूँ हुई बसर तन्हा
एक परवाज दिखाई दी है
दिन कुछ अैसे गुजारता है कोई
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